बिहार विधान परिषद (Bihar Legislative Council) का इतिहास बेहद समृद्ध और गौरवशाली रहा है। यह भारत की उन चुनिंदा राज्यों की विधान परिषदों में शामिल है, जो द्विसदनीय व्यवस्था (Bicameral System) के तहत कार्य करती हैं।
🔹 बिहार विधान परिषद का गठन कब और क्यों हुआ?
बिहार विधान परिषद का गठन बिहार सरकार अधिनियम, 1935 के तहत किया गया था। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत सरकार अधिनियम, 1919 और 1935 के माध्यम से राज्यों में द्विसदनीय प्रणाली को बढ़ावा दिया गया। इसी क्रम में, बिहार विधान परिषद का गठन वर्ष 1937 में हुआ।
🔹 विधान परिषद क्यों बनाई गई?
✔ राज्य में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए
✔ विधानसभा के फैसलों की समीक्षा करने के लिए
✔ विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों को विधायी प्रक्रिया में शामिल करने के लिए
✔ नीतियों और कानूनों को संतुलित दृष्टिकोण से जांचने के लिए
🔹 विधान परिषद की विशेषताएँ
1️⃣ सदस्य संख्या: बिहार विधान परिषद में वर्तमान में 75 सदस्य होते हैं।
2️⃣ सदस्य चयन प्रक्रिया:
27 सदस्य विधानसभा द्वारा चुने जाते हैं
24 सदस्य स्थानीय निकायों से आते हैं
6 सदस्य शिक्षकों के कोटे से आते हैं
6 सदस्य स्नातक कोटे से चुने जाते हैं
12 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं
3️⃣ कार्यकाल: विधान परिषद के सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है और हर 2 साल में एक तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं।
🔹 बिहार विधान परिषद का महत्व
✅ यह कानून निर्माण की प्रक्रिया को और अधिक परिपक्व और संतुलित बनाता है।
✅ यह अनुभवी और विशेषज्ञ सदस्यों को राजनीति में योगदान देने का अवसर देता है।
✅ यह विधान सभा के कानूनों और नीतियों की पुनः समीक्षा और सुझाव देने का कार्य करता है।
✅ इसमें शिक्षकों और स्नातकों के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था से शिक्षा और बौद्धिक चर्चाओं को बढ़ावा मिलता है।
🔹 निष्कर्ष
बिहार विधान परिषद की स्थापना लोकतांत्रिक मजबूती का एक महत्वपूर्ण कदम थी। यह न केवल कानून बनाने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाती है, बल्कि इसमें बुद्धिजीवियों, शिक्षकों और विशेषज्ञों को भी प्रतिनिधित्व मिलता है, जिससे राज्य की नीतियां और कानून अधिक जनहितकारी बनते हैं।